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छत्तीसगढ़ की औषधीय शक्ति: जड़ी-बूटियों से संवर रहा ग्रामीण महिलाओं का भविष्य

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रायपुर, 03 मई 2026

छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में छिपी प्राकृतिक संपदा अब केवल इलाज का साधन नहीं, बल्कि प्रदेश की महिलाओं के लिए आर्थिक आजादी का जरिया बन रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ‘सुशासन’ के संकल्प को पूरा कर रही है। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप और औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष श्री विकास मरकाम के मार्गदर्शन में औषधीय पौधों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाया जा रहा है। अश्वगंधा, गिलोय, शतावरी और सफेद मूसली जैसी जड़ी-बूटियां अब सीधे तौर पर नारी शक्ति को सशक्त कर रही हैं।

विरासत और विज्ञान का अनूठा मेल

राज्य सरकार वनांचल के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ रही है। स्थानीय वैद्यों और जानकारों की पहचान कर उनके अनुभव को एक आधिकारिक मंच दिया जा रहा है। बोर्ड का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि असाध्य रोगों के उपचार का यह प्राचीन ज्ञान लुप्त न हो, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का स्थायी स्रोत बने। यह कदम न केवल हमारी संस्कृति का सम्मान है, बल्कि जनजातीय ज्ञान को वैश्विक पहचान दिलाने की एक मुहिम भी है।

संग्रहण से प्रसंस्करण: उद्यमी बन रही हैं महिलाएं

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव महिलाओं की भूमिका में आया है। अब वे केवल जड़ी-बूटी इकट्ठा करने वाली मजदूर नहीं, बल्कि प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) करने वाली उद्यमी बन चुकी हैं। महिला स्व-सहायता समूहों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे वे कच्चे माल से अर्क, चूर्ण और तेल जैसे उत्पाद तैयार कर रही हैं। 1500 से अधिक वैद्यों के ज्ञान और 65 से अधिक लघु वन उपजों की समर्थन मूल्य पर खरीदी ने बिचौलियों का खेल खत्म कर दिया है, जिससे सीधा लाभ महिलाओं के बैंक खातों में पहुँच रहा है।

‘छत्तीसगढ़ हर्बल्स’ और ग्लोबल ब्रांडिंग

प्रदेश के उत्पादों को ‘छत्तीसगढ़ हर्बल्स’ ब्रांड के तहत अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल रही है। बस्तर की दुर्लभ जड़ी-बूटियां जैसे सर्पगंधा और कुटकी अब शहरी बाजारों और रिटेल आउटलेट्स तक पहुँच रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ और मुख्यमंत्री के ‘लखपति दीदी’ विजन को यह पहल नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है।

घर-आँगन में रोजगार और नर्सरी प्रबंधन

पर्यावरण और रोजगार के बीच तालमेल बैठाते हुए अब ‘मदर नर्सरी’ का प्रबंधन महिला समूहों को सौंपा गया है। दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण के साथ-साथ किचन गार्डन और टेरेस गार्डनिंग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ा है, बल्कि वनांचल से होने वाले पलायन में भी भारी कमी आई है। सामूहिक प्रयास और सही नीति के चलते आज छत्तीसगढ़ की महिलाएं आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं।

pithorawale
Author: pithorawale

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